कुछ पसंदीदा शायरी

ख़ुद अपने सर ये बला कौन मोल लेता है
मोहब्बत आप से होती है की नहीं जाती
- वामिक़ जौनपुरी

बिछड़ते वक़्त किसी की आँख में जो आता है
तमाम उम्र वो आँसू बहुत रुलाता है
- वसीम बरेलवी

कितनी आसानी से मशहूर किया है ख़ुदको
मैनें अपने से बड़े शख़्स को गाली देकर
- ज़फ़र गोरखपुरी

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं
- अहमद फ़राज़

सो जाता है फूटपाथ पे अख़बार बिछा कर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाता
- मुनव्वर राना

ये चार दिन के तमाशे हैं आह दुनिया के
रहा जहाँ में सिकंदर न और न जम बाक़ी
- भारतेंदु हरिश्चंद्र

इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं
- बशीर बद्र

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
- बशीर बद्र

देखने के लिए सारा आलम भी कम
चाहने के लिए एक चेहरा बहुत
- असअद बदायुनी

शिद्दत-ए-लखनऊ, अरे तौबा
फिर वही हम, वही अमीनाबाद
- यगाना चंगेज़ी

अपने सब यार काम कर रहे हैं
और हम हैं के नाम कर रहे हैं
- जौन एलिया

एक लम्हे में कटा है मुद्दतों का फ़ासला
मैं अभी आया हूँ तस्वीरें पुरानी देख कर
- शहज़ाद अहमद

बैर दुनिया से, क़बीले से लड़ाई लेते
एक सच के लिए किस-किस से बुराई लेते
- राहत इंदौरी

वो गुफ़्तुगू जो मेरी सिर्फ़ अपने-आप से थी
तेरी निगाह को पहुँची तो शाइरी हुई है
- इरफ़ान सत्तार

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते
वरना इतने तो मरासिम थे के आते-जाते
- अहमद फ़राज़

जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
- बशीर बद्र

उस तश्ना लब की नींद ना टूटे दुआ करो
जिस तश्ना लब को ख़्वाब में दरिया दिखाई दे
- कृष्ण बिहारी नूर

हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब
ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया
- शहज़ाद अहमद

पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
- ग़ालिब

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया
होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया
- निदा फ़ाज़ली

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
समुंदरों ही के लहजे में बात करता है
- वसीम बरेलवी

मुझे तो मार ही डालेगा ख़ालीपन मेरा
जो दिल से तेरी जुदाई का ग़म निकल जाए
- राहत इंदौरी

ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगाह-ए-शीशागरी का
- मीर तक़ी मीर
(आफ़ाक़ = the world)
(कारगाह-ए-शीशागरी = workshop of making glass)

कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं
नाख़ुदा जिनका नहीं उनका ख़ुदा होता है
- बेदम शाह वारसी
(नाख़ुदा = boatman)

मेरी खूबी पे सब अहले ज़ुबां खामोश रहते हैं
मेरे एैबों पे चर्चा हो तो गूंगे बोल पड़ते हैं
- इमरान प्रतापगड़ी

वैसे तो एक आँसू बहाकर मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नही सकता
- निदा फ़ाज़ली

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में
- सीमाब अकबराबादी

बिखर बिखर सी गई है किताब साँसों की
ये काग़ज़ात ख़ुदा जाने कब कहाँ उड़ जाएँ
- राहत इंदौरी

गैरों से कहा तुमने गैरों से सुना तुमने
कुछ हमसे कहा होता कुछ हमसे सुना होता
- चिराग हसन हसरत

बाज़िचा-ए-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे
- ग़ालिब
(बाज़िचा-ए-अत्फाल = children's playground)

हर सुब्ह अपने घर में उसी वक़्त जागना
आज़ाद लोग भी तो गिरफ़्तार से रहे
- सुहैल अहमद ज़ैदी

लगता तो बेख़बर-सा हूँ लेकिन ख़बर में हूँ
तेरी नज़र में हूँ तो मैं सबकी नज़र में हूँ
- वसीम बरेलवी

जिनका पेशा हो मसायिल की तिजारत करना
कब वो चाहेंगे कोई मसला हल हो जाए
- शायर जमाली

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा
घर छोड़ के मत जाओ कहीं घर न मिलेगा
- बशीर बद्र

मैं रोज़ इधर से गुज़रता हूँ, कौन देखता है
मैं जब इधर से न गुज़रूँगा, कौन देखेगा
- मजीद अहमद

जो देखता हूँ वही बोलने का आदी हूँ
मैं अपने शहर का सब से बड़ा फ़सादी हूँ
- जौन एलिया

मैं आज ज़द पे अगर हूँ, तो खुश गुमान न हो
चराग़ सब के बुझेंगे, हवा किसी की नहीं
- अहमद फ़राज़

एक ख़बर थी जिसे ज़ाहिर ना किया हमने कभी
एक ख़ज़ाना था जिसे ज़र-ए-ज़मीं रहने दिया
- ज़फ़र इक़बाल

जो पढ़ा है उसे जीना ही नहीं है मुमकिन
ज़िंदगी को मैं किताबों से अलग रखता हूँ
- ज़फ़र सहबाई

कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त,
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया
- साहिर लुधियानवी

बस्ती में अपनी हिन्दू-मुसलमाँ जो बस गए
इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए
- कैफ़ी आज़मी

मैं वो दरिया हूँ के हर बूँद भंवर है जिसकी
तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके
- राहत इंदौरी

हुई मुद्दत कि उन को ख़्वाब में भी अब नहीं देखा
मैं जिन गलियों में अपने दोस्तों के साथ खेला था
- हमीद जालंधरी

ज़िंदगी जीने का पहले हौसला पैदा करो
सिर्फ़ ऊँचे ख़ूबसूरत ख़्वाब मत देखा करो
- मंज़र भोपाली

दहलीज़ अपनी छोड़ दी जिस ने भी एक बार
दीवार-ओ-दर ही उस को मिले घर नहीं मिला
- हस्तीमल हस्ती

जानकारी खेल लफ़्ज़ों का ज़बाँ का शोर है
जो बहुत कम जानता है वो यहाँ शह-ज़ोर है
- अहमद शनस

हो जाए जहाँ शाम वहीं उन का बसेरा
आवारा परिंदों के ठिकाने नहीं होते
- मख़मूर सईदी

नक़्शा उठा के कोई नया शहर ढूँडिए
इस शहर में तो सब से मुलाक़ात हो गई
- निदा फ़ाज़ली

लहर के सामने साहिल की हक़ीक़त क्या है
जिन को जीना है वो हालात से डरते कब हैं
- फ़ारूक़ शमीम

कौनसी बात कब कहाँ कही जाती है
ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है
- वसीम बरेलवी

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